बदलाव की घोषणा

नए विज़ वर्ष की पहली मौद्रिक नीति में ज्याज दरें घटने की उज्मीद तो नहीं थी, अलबजा सबका ध्यान इस तर जरूर था कि मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) आने वाले दिनों में ज्याज दरों की नरमी का कोई संकेत देती है या नहीं। पिछले कुछ दिनों में महंगाई की रज्तार घटी है, और सबसे बड़ी बात यह कि चुनावी साल शुरू होने को है, लिहाजा कुछ घरेलू बैंकों की ओर से हाल में ज्याज दरें बढ़ा दिए जाने के बावजूद भारतीय रिजर्व बैंक से इस साल ज्याज दरों में कम से कम एक कटौती की उज्मीद तो की ही जा सकती है। अफसोस कि ज्याज दरों में किसी भी बदलाव की घोषणा न करने वाले एमपीसी के इस वक्तव्य में घोल-मट्टा इतना ज्यादा है कि लाख कोशिशों के बावजूद वहां से ऐसा कोई संकेत खोज पाना लगभग असंभव है। एक क्षीण सी उज्मीद जून में तो नहीं, अगस्त में चौथाई फीसदी कटौती की बांधी जा सकती है, बशर्ते मानसून अच्छा आए, चीन और अमेरिका के बीच जारी ट्रेड वॉर ज्यादा जोर न पकड़े, और कच्चे तेल की कीमतें अभी के स्तर से ऊपर न चढ़ें। दरअसल, संकेतों के मामले में अपनी मुट्ठी बंद रखना आरबीआई के लिए फिलहाल चॉइस का नहीं, मजबूरी का मामला है। अमेरिका समेत दुनिया की लगभग हर अर्थव्यवस्था में पिछले कई महीनों से ज्याज दरें या तो बढ़ रही हैं, या बढ़ने का संकेत देती हुई अपनी जगह पर स्थिर हैं। देश के भीतर ही नजर फेरें तो स्टेट बैंक ऑफ इंडिया समेत कई सारे बैंक अपनी ज्याज दरें बढ़ा रहे हैं, हालांकि ऐसा उन्हें किसी आर्थिक तर्क के बजाय बट्टा खाते में पड़े अपने कों की भरपाई के लिए करना पड़ रहा है। सज्त होती ज्याज दरों के माहौल में भारतीय रिजर्व बैंक के लिए राहत की बात सिर्फ इतनी है कि इस सीजन में अज्सर ऊंची हो जाने वाली मीट, मछली, अंडा, दलहन और सज्जियों की कीमतें काबू में बनी हुई हैं, और बाहर मांग कम होने की वजह से बाकी सामानों की महंगाई भी कुछ खास नहीं बढ़ी है। ऐसे में पॉपुलर खर्चों के मामले में सरकारें अगर अपना हाथ टाइट रखें तो चुनाव से पहले ज्याज दरें ऊपर नहीं चढ़ेगी और किस्मत ठीक रही तो एक बार शायद थोड़ी नीचे भी आ जाएं।