बदलाव की पहल का ऐतिहासिक आंदोलन

जब भी हम किसानों के आन्दोलन की बात करते हैं तो दिमाम में अवध का किसान आन्दोलन उभरता हैयह संभवत: देश का सबसे बड़ा किसान आन्दोलन थाइसने इतना असर डाला कि आजादी की लड़ाई लड़ रही कांग्रेस को भी किसान की समस्याओं से रूबरू होना पड़ा। यूं तो 1917 में मोतीलाल नेहरू, मदन मोहन मालवीय और गौरीशंकर मिश्र आदि ने उत्तर प्रदेश किसान सभा बनाई थी। मगर गांधी जी के खिलाफत आन्दोलन के कारण उप्र किसान सभा में मतभेद प्रकट होने लगे। आखिरकार अवध के किसान नेताओं ने बाबा रामचन्द्र के नेतृत्व में 1920 में उत्तर प्रदेश किसान सभा से नाता तोड़कर 17 अक्तूबर, 1920 को अवध किसान सभा बना ली। चूंकि उत्तर प्रदेश किसान सभा में अवध के किसानों की भागीदारी ही सबसे ज्यादा थी, इसलिए बाबा रामचंद्र ने अपने किसान संगठन का नाम अवध किसान सभा रखा। प्रतापगढ़ जिले का खरगांव किसान सभा की गतिविधियों का प्रमुख केन्द्र बना। यह किसान सभा किसानों के हक में ब्रिटिश हुकूमत के सामने अपनी मांगें रखती थी और दबाव डालकर वाजिब मांगें मनवाती भी थी, लेकिन गठन के दो साल बाद 1919 के अन्तिम दिनों में किसानों का संगठित विद्रोह खुलकर सामने आयाअवध के किसान नेताओं में बाबा रामचन्द्र, गौरीशंकर मिश्र, माताबदल पांडेय, झिंगुरी सिंह आदि शामिल थे। उत्तर प्रदेश किसान सभा से नाता तोडकर अवध किसान सभा तो बन ही चकी थी। एक महीने के भातर ही अवध की उत्तर प्रदेश किसान सभा की सभी इकाइयों का अवध किसान सभा में विलय हो गया। इन नेताओं ने प्रतापगढ़ की पट्री तहसील के खरगांव को नवगठित किसान सभा का मख्यालय बनाया और यहीं पर एक किसान काउंसिल का भी गठन किया। इस नवगठित अवध किसान सभा के निशाने पर मलतः जमादार और ताल्लकेदार थे। उत्तर प्रदेश के हरदोई. बहराइच एवं सीतापुर जिलों में लगान में वृद्धि एवं उपज के रूप में लगान वसली को लेकर अवध के किसानों ने एका आन्दोलन चलाया था। इस आन्दोलन में कछ जमींदार भी शामिल थे। इस आन्दोलन के प्रमख नेता मदारी पासी और सहदेव थे।अवध में जिस समय किसान अवध किसान सभा के बैनर तले इकटा हो रहे थे. उसी समय रूस में बोल्शेविक क्रांति हई। ब्रिटिश हकमत आन्दोलनकारी किसानों के लिए बोल्शेविक. लटरे और डाकू जसे शब्दों का प्रयोग करती थी। द्वितीय विश्वयद्ध के छंटनीशदा सैनिकों ने भी किसान आन्दोलन में महत्वपर्ण भूमिका निभाई। साधुओं और फकीरों की जमात भी इस आन्दोलन में शरीक थी। किसान आन्दोलन में महिलाओं की सक्रिय भागीदारी अवध किसान सभा की महत्वपूर्ण विशेषता थी। आगे चलकर महिलाओं को संगठित शक्ति का प्रतिरूप अखिल भारतीय किसानिन सभा के रूप में सामने आया। बाबा रामचंद्र की यह किसान सभा एक तरह से उन किसानों का संगठन थी, जो किसान भूमिधर कम ज्यादातर बटाईदार और खेतिहर मजदूरथे। उन पर बेदखली की तलवार हर वक्त लटकी रहती थी बाबा रामचंद्र ने चम्पारण में निलहे गोरों के खिलाफ गांधी जी की अगुआई में शुरू हुए आन्दोलन को देखा था और उसका असर भी। इसलिए बाबा जी खुद गांधी जी से प्रभावित थे। गांधी जी और कांग्रेस ने किसानों की पीड़ा को व्यापक रूप दिया और उसे आजादी के हथियार के रूप में इस्तेमाल किया किन्तु बाबा रामचंद्र जानते थे कि जब तक ये किसान मजदूर खुद खड़े होकर अपने लिए नहीं लड़ेंगे, तब तक आजादी एक छलावा ही रहेगी। अंग्रेज चले जाएंगे तो काले अंग्रेज आ जाएंगे, इसलिए महाजनों, जमींदारों और सूदखोरों से किसानों को लड़ना ही पड़ेगा। दरअसल एक मई 1876 को भारत में विधिवत ब्रिटिश हुकूमत कायम हुई ___लेकिन इससे न तो भारत का भाग्य बदला, न किसानों की पीड़ा । अंग्रेज सरकार किसानों का दमन तो करती ही थी, स्थानीय महाजनों, साहूकारों और जमींदारों ने सूद के बदले उनके खेत व जेवर छीनने शुरू कर दिए। बीसवीं सदी के शुरू होते ही बंगाल सूबे का बंटवारा हो गया और नई रैयतवारी व्यवस्था तथा बंदोबस्त प्रणाली लागू हुई। अवध के किसानों पर इसका और भी बुरा असर पड़ा। जमीनें बढ़ाने के लिए जंगलों को उजाड़ा जाने लगा और नौतोड की इस व्यवस्था में किसानों ने मेहनत तो खूब की पर उन्हें अपनी इस मेहनत का लाभ नहीं मिला। उपजाऊ नई जमीनें समतल तो किसान करते लेकिन जैसे ही उनमें फसल उगाने का क्रम शुरू होता. उन पर लगान की नई दरें लागू हो जातीं। ऐसे ही बरे समय में मोहनदास करमचंद गांधी ने राजनीति में आकर निलहे गोरों के जुल्मों को सबके समक्ष रखा। चंपारण में राजकुमार शुक्ल के साथ मोतिहारी जाकर उन्होंने किसानों की पीड़ा को महसूस किया और किसानों को निलहे गोरों के जुल्म से आजाद कराया। लेकिन दूसरे विश्वयुद्ध के बाद से किसानों का गांधी जी से मोहभंग हो गया ।पूरे अवध के इलाके में किसान तबका बुरी तरह परेशान था। शहरी क्षेत्रों में नई मिलें खुल जाने तथा रेलवे, कचहरी और व्यापार के चलते गांवों का पढ़ा-लिखा तबका शहर आ बसा। शहरों की इस कमाई से उसने गांवों में जमींदारी खरीदनी शुरू कर दी। ये नए कुलक किसी और गांव में जाकर जमींदारी खरीदते और अपनी रैयत से गुलामों जैसा सलूक करते। इन जमींदारों को कांग्रेस का परोक्ष समर्थन भी रहता। यह वह दौर था जब अवध में किसानों के संगठन बाबा रामचंदर (बाबा रामचंद्र को अवध में इसी नाम से जाना गया) या मदारी पासी के नेतत्व में बनने लगे। बिहार में निवेणी संप और अपने तीसा आंदोलन इसी दौर में पनपे। इनको परोक्ष रूप से क्रांतिकारी संगठन हिंदुस्तान रिपब्लिकन आर्मी और साम्यवादी संगठनों का भी समर्थन था मोहन गोकुल जी, राहुल सांकृत्यायन, स्वामी सहजानंद भी किसानों को संगठित करने में लगे थे। यह तीसा आंदोलन काफी व्यापक रूप से फैला लेकिन सही जी के असहयोग और जवाहर लाल नेहरू की सील के चलते यह आंदोलन अंग्रेजों दारा कचल दिया गया पर इससे यह समाप्त नहीं हआ। अंग्रेजों को किसानों को तमाम सहलियतें देर-सबेर देनी पडी और एक निश्चित अवधि के बाद किसानों को जमीन पट्टे पर लिखनी पड़ी। पहले विश्वयुद्ध के कुछ पहले जब निलहे गोरों से किसानों को मुक्ति मिल गई तो देसी निलहों ने उन जमीनों पर कब्जा कर लिया और अपने कारकनों के सहारे किसानों पर जल्म करने लगे। देने की व्यवस्था के कारण किसान के पास कछ हो या न हो. लगान भरना ही पड़ता था। मीनालीले अवध में किसानों का एक बड़ा आंदोलन हआ।