हमारे समाज में शिक्षक काफी सम्मान का पात्र समझा जाता रहा है। देश की भावी पीढ़ी या भविष्य कहलाने वाले बच्चों और अंतत- समाज को शिक्षा व सही दिशा-निर्देश देने की शिक्षक की भूमिका में तो अब भी कोई बदलाव नहीं हुआ है, पर आधुनिक व्यवस्था में वह समाज के सबसे निरीह प्राणी के रूप में देखा जाने लगा है। इसका कारण सिर्फ यह नहीं है कि शिक्षक के रूप में कुछ लोगों ने समाज का सिर शर्म से झकाने वाली काली करतूतें की हैं बल्कि यह भी है कि शिक्षक को चंद हजार रुपए के वेतन के बदले काम करने वाला ऐसा कर्मचारी मान लिया गया है जो सिर झुका कर व्यवस्था के सारे आदेश मान लेता है। निजी स्कूलों में वह बेहद मामूली वेतन पर काम करने को मजबूर है तो सरकारी विद्यालयों में उसे पठन-पाठन के अलावा व्यवस्था से जुड़े ऐसे- ऐसे कार्य करने को मजबूर किया जाता है जिनका शिक्षण से दूर-दूर तक कोई वास्ता नहीं होता। हाल में शिक्षकों की ऐसी दशा को लेकर उठे एक मामले में सर्वोच्च अदालत ने भी टिप्पणी की है। अदालत ने बिहार में नियोजित शिक्षकों को चपरासी से भी कम वेतन देने पर फटकार लगाई है और कहा है कि जो शिक्षक देश के भविष्य का निर्माण करने वाले माने जाते हैं, खुद उनका भविष्य इतना अंधकारमय क्यों रखा जा रहा है। अदालत ने इस पर हैरानी जताई कि बिहार में आखिर एक शिक्षक का वेतन 21 हजार रुपए प्रतिमाह क्यों है, जबकि चपरासी का वेतन 36 हजार रुपए है। यह सच में एक विडंबनापूर्ण स्थिति है कि सरकारी स्कूलों के अध्यापकों को भी इस तरह की वेतन विसंगति का सामना करना पड़ रहा है। निजी स्कूलों में शिक्षक की दुर्दशा के बारे में तो जितना कहा जाए, कम है। देश में शायद ही ऐसा कोई निजी स्कूल होगा जो शिक्षक को पांच-सात रुपए का वेतन पकड़ा कर उससे पंद्रह-बीस हजार रुपए के हलफनामे पर दस्तखत नहीं कराता होगा। अब तो हिसाब-किताब में सरकार की सख्ती के बाद निजी स्कूलों के संचालक शिक्षकों के बैंक खाते में शिक्षा बोडों द्वारा निर्धारित वेतन डालते हैं जिसमें से आधी या ज्यादा रकम निकाल कर अगले दिन शिक्षकों को स्कूल प्रबंधन के पास जमा करानी होती है। जो शिक्षक इसकी शिकायत करता है या रकम जमा कराने में आनाकानी करता है, उसे तुरंत नौकरी से हटा दिया जाता है। क्या सरकार इसकी रोकथाम का कोई उपाय कर सकती है? बहरहाल, जहां तक कम वेतन के बावजूद शिक्षक के कामकाज का सवाल है, तो ध्यान रहे कि अध्यापन के अलावा एक शिक्षक से अमूमन अपेक्षा होती है कि वह बच्चों में नैतिक बल पैदा करे, उन्हीं सही-गलत का फर्क बताए, देशप्रेम का पाठ पढ़ाए और अनुशासन का महत्त्व समझाए। इसमें कोई संदेह नहीं कि ये सभी एक आदर्श शिक्षक के लिए जरूरी कर्तव्य हैं, वह इनसे मुंह नहीं चुरा सकता है। पाठ्यक्रम पूरा कराना, समय पर परीक्षा लेना, कापियां जांचना और उचित मूल्यांकन कर अच्छे छात्रों को प्रोत्साहित करना और पिछड़ने वाले छात्रों की कमियां दूर कर उन्हें आगे बढ़ाना भी एक शिक्षक की ड्यूटी है। पर लंबे समय से सरकारी शिक्षक इनके अलावा भी कई ऐसे काम करते रहे हैं जिन्हें देश या समाज की सेवा की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। जैसे चुनावों से संबंधित कार्य करना, जनगणना सरीखे कार्यों में संलग्न होना। देशप्रदेश में जब भी चुनाव होते हैं, प्रशासन को चुनाव ड्यूटी के लिए शिक्षक ही याद आते हैं। जनगणना जैसे जरूरी कार्यों में भी शिक्षकों की तैनाती होती है ।एक वक्त था, जब देश स्नातक स्तर की डिग्री रखने वाले लोग कम थे। तब शिक्षकों को जनगणना अथवा चुनाव ड्यूटी में लगाने
राजनीति शिक्षक को मजबर बनाती व्यवस्था
• Mohd.Shakir